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शताब्दी स्मरण : डॉ. नामवर सिंह

 

नामवर सिंह जन्म -28 जुलाई 1926, निधन -19 फरवरी 2019

जन्म 28 जुलाई 1926 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी (अब चंदौली के अंतर्गत ) जिले के जीयनपुर गाँव में हुआ।  उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वहीं प्राप्त की। इसके बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए वाराणसी चले गए और वाराणसी के उदय प्रताप स्वायत्त महाविद्यालय में मैट्रिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने उच्च अध्ययन के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने 1949 में स्नातक और 1951 में स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी की देखरेख में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की पीएचडी पूरी करने के बाद, सिंह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। कुछ समय के लिए उन्होंने सागर विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया। बाद में वे जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर बने । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उन्होंने पढ़ाने का एक नया पैटर्न बनाया और पाठ्यक्रम तैयार किया। वे जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के संस्थापक और पहले अध्यक्ष थे। वे वर्ष 1992 में जेएनयू से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र में प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में कार्य किया। 1959 में, उत्तर प्रदेश के चंदौली निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के उम्मीदवार के रूप में आम चुनाव लड़े, लेकिन असफल रहे । उन्हें 18,000 से ज़्यादा वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे। 

अपनी अकादमिक व्यस्तता के अलावा, उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्रिका जनयुग और साहित्यिक आलोचना के लिए हिंदी पत्रिका आलोचना के संपादक के रूप में काम किया। जेएनयू से सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का कुलपति नियुक्त किया गया। उन्होंने राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया । वे ज्ञानपीठ पुरस्कार के चयन बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में रहे। नामवर सिंह का 19 फरवरी 2019 को दिल्ली में 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं : कविता के नये प्रतिमानछायावाद, दूसरी परम्परा की खोजइतिहास और आलोचना आदि।

कविता के नये प्रतिमान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार । हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा शलाका सम्मान। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, भारत भारती सम्मान। राष्ट्रकवि कुवेम्पु प्रतिष्ठान द्वारा कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार। हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. ।


कवि विनोद दास का संस्मरण

 

नामवर सिंह जैसे आलोचक अब विरल होते जा रहे हैं

पहला दृश्य :

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि केदार नाथ सिंह के साथ उनके घर में बैठा हूँ। उनसे समकालीन कविता पर संवाद चल रहा है। अचानक वह पूछते हैं, ”नामवर जी से मिले?” उनके इस नुक्ते पर मेरी साँस थोड़ी देर के लिए रुक जाती है। नकार की मुद्रा में सिर हिलाने के साथ मैं कहता हूँ, "नहीं।” न जाने क्यों केदार जी यह सवाल अक्सर पूछते हैं जब मैं उनसे मिलने जाता हूँ। 

दूसरा दृश्य :

यह एक अच्छा संयोग है कि केदार जी के साथ जा रहा हूँ कि सहसा जवाहरलाल नेहरू परिसर के बस अड्डे पर सहसा नामवर जी दिख जाते हैं। केदार जी उनसे मुलाकात कराते हैं। धोती-कुर्ता में सुगठित लम्बी कद-काठी। उन्हें देख कर अनायास डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी की याद आती हैं। नामवर जी मेरी तरफ़ तिरछी नज़र डालते हैं। मेरे नमस्कार का उत्तर देते हुए ठहरी बस पर फौरन चढ़ते हुए केदार जी से कहते हैं कि वह अमुक छात्र को देखने अस्पताल जा रहे हैं। वह सीरियस है।

तीसरा दृश्य :

समकालीन आलोचना के क्षेत्र में आप किन्हें महत्त्वपूर्ण आलोचक मानते है, एक इंटरव्यू के दौरान यह सवाल पूछने पर साहित्य के शीर्ष साहित्यकार अज्ञेय एक दो नाम गिनाने के बाद मुझसे कहते हैं कि “नामवर सिंह जी की आलोचना से कई बार ऐसा लगता है कि साहित्य की समझ तो उनको है लेकिन वह पूरी तरह प्रकट नहीं होती क्योंकि मतवाद के बन्धन के बाहर वह जाना नहीं चाहते। इसलिए जो वह मानते हैं या अनुभव करते है और जो लिखते हैं, उसमें लगातार अन्तर होता है। उनके अनुभव और लिखने में फाँक है।” 

चौथा दृश्य : 

एक कार में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजय देव नारायण साही के साथ मैं भी हूँ। उन दोनों के  बीच इलाहाबाद को ले कर हास-परिहास चल रहा है। उनकी बातचीत की सुई अचानक नामवर सिंह पर ठहर जाती है। साही जी अचानक कहकहा लगा कर कहते हैं कि नामवर की आलोचना पुस्तक “कविता के नए प्रतिमान” के लिए नामवर को मिले साहित्य अकादमी के पुरस्कार का आधा हकदार मैं हूँ। उन्होंने उस किताब में सबसे ज़्यादा मुझे उद्धृत किया है। सर्वेश्वर जी दबी हँसी हँसते हैं। 

कुछ अन्य दृश्यों का कोलाज :

साहित्य संसार में कोई कहता कि इस मुद्दे पर नामवर जी की राय नहीं आई है। उनकी राय को लेकर साहित्य की दुनिया में बेकरारी है। किसी मुद्दे पर कोई कहता कि इस मुद्दे पर नामवर जी  की राय अलहदा है। कोई किसी पुस्तक विमोचन सभा में किसी के कान के पास जा कर फुसफुसा कहता कि यह किताब राजकमल से न छपती अगर नामवर जी सिफ़ारिश न करते। कोई किसी को इशारा कह कर कहता कि उसे नौकरी अमुक कॉलेज या विश्वविद्यालय में नामवर जी की कृपा से मिली है। कोई गुब्बारे से फूला हुआ अपने साहित्यिक मित्रों के बीच गरूर से सिर भारी करके इसलिए टेढ़े-टेढ़े चलता कि उसकी रचना पर नामवर सिंह ने अपने व्याख्यान में जिक्र किया है। उनके समवयसी साहित्यकार चिढ़ते कि काश! नामवर जी कभी मेरी रचना के बारे में कुछ आप्त वचन बोलते। 

यह अद्भुत है कि साहित्य के केन्द्र में कोई रचनाकार नहीं, आलोचक डॉक्टर नामवर सिंह हैं। 

सच कहूँ! उन दिनों हिन्दी साहित्य की डूबती-उतराती दुनिया में नामवर जी का तिलिस्म मुझे समझ में नहीं आता था। ऐसे क्षणों में अपनी अज्ञानता पर कोफ़्त भी होती थी। नामवर जी की आलोचना जगत में दुन्दुभी बजती थी और मैं उनकी दुनिया से बाहर था।

एक कारण शायद यह था कि मैं तब तक हिन्दी आलोचना कम पढ़ता था। कुँवर नारायण जी के यहाँ “आलोचना” पत्रिका रैक पर रखी देखता था। उसमें आयी कविता को पढ़ कर मैं उसे उलट-पलट कर रख देता था। कभी उसे माँग कर पढ़ने के लिए नहीं ले जाता। हालाँकि “पूर्वग्रह” पत्रिका में प्रकाशित मलयज के आलोचनात्मक लेखों को पढ़ना मुझे प्रिय था। दूसरे, हिन्दी साहित्य का मैं छात्र नहीं था जिसके चलते अकादमिक क्षेत्र में नामवर जी के वर्चस्व के महत्त्व को जानता-समझता नहीं था। खुद कुछ ऐसा लिखा नहीं था कि प्रकाशन के लिए उनकी सिफ़ारिश या उनकी सम्मति के लिए मेरे भीतर कोई ऐषणा हो। नामवर जी के बारे में यह मशहूर था कि वह अद्भुत वक्ता हैं लेकिन मैंने पटना प्रवास के पहले उनका कोई व्याख्यान भी नहीं सुना था। एक तरह से मैं नामवर जी के प्रभामण्डल के बारे में सुनता जरूर था लेकिन वह मुझे एक भ्रम की तरह लगता था। 

साहित्यकार से रिश्ता जोड़ने के लिए उतना मिलना नहीं, जितना पढ़ना जरूरी होता हैं। किताब के पाठ से हम लेखक के रूप-रंग और आँखों को पहचान लेते हैं। उसकी आवाज़ सुन पाते हैं, उसके स्पर्शों को छू पाते हैं, उनके इशारों को समझ पाते हैं, उसके मन को पढ़ पाते हैं। इस दृष्टि से नामवर जी से के रचनात्मक व्यक्तित्व से मेरा पहला परिचय तब हुआ जब पटना में राजकमल प्रकाशन से खरीद कर मैंने उनकी किताब “इतिहास और आलोचना” पढी। उस किताब ने मुझे बाँध लिया। एक तरह से उनकी आलोचकीय ज़मीन से परिचय हुआ। उनके प्रति उदासीनता की बर्फ़ टूटी। फिर मैं उनकी किताब 'छायावाद', 'कविता के नये प्रतिमान' और 'कहानी-नयी कहानी' एक साथ ले आया। उन्हीं दिनों पटना में अरुण कमल के जरिये डॉक्टर नन्द किशोर नवल और डॉक्टर खगेन्द्र ठाकुर से परिचय हुआ। इन तीनों के बातचीत में नामवर जी की चर्चा अनायास आ जाती थी। 

नामवर जी उन दिनों बिहार बहुधा आते थे। मैंने उनके कई व्याख्यान सुने। उनके व्याख्यान इतने सुगठित, सुविचारित होते थे जैसे कोई वह लेख पढ़ रहे हों। यही नहीं, उनके व्याख्यानों में किसी भी विषय को देखने का नज़रिया कुछ अलग होता था। अब मेरा उनके प्रति आकर्षण बढ़ने लगा। आलोचना में मेरी रूचि जगने लगी। डॉक्टर नन्दकिशोर नवल ने आलोचना पत्रिका के लिए एक दो लेख भी लिखवाये। राजेश जोशी जी ने अपनी पत्रिका “इसलिए" के लिए विष्णु नागर पर आग्रह करके मुझसे लिखवाया। 

आपको यह पूर्वरंग उबाऊ लग सकता है और भूल-भुलैया भरा भी। लेकिन नामवर जी से मेरी पहली ठीक-ठाक मुलाक़ात रोचक थी। दरअसल उन समय कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी की किताब "कुछ पूर्वग्रह” प्रकाशित हुई थी। अशोक वाजपेयी की आलोचना की किताब “फिलहाल” मैं पढ़ चुका था। वह किताब मुझे अकादमिक आलोचना से कुछ इतर और विचारोत्तेजक लगी थी। उन दिनों अशोक वाजपेयी की सांस्कृतिक जगत में धूम मची थी। वैसे अभी भी रज़ा न्यास के जरिए मची रहती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के भरोसेमन्द अफ़सर होने के कारण भारत भवन सरीखे कला भवन का निर्माण करवा कर वह राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुके थे। इसी बीच दिसम्बर 1984 में यूनियन कार्बाइड की कीटाणुनाशक फैक्ट्री में मिथायल गैस रिसाव से भोपाल लगभग 15000 लोगों की मौत हो गयी। लगभग छह लाख लोग इस त्रासदी से प्रभावित हो गये। आजादी के बाद भारत में यह सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी। 

भारत भवन में विश्व कविता का आयोजन पूर्व निर्धारित था। भोपाल गैस त्रासदी के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी के बड़े हल्के में इस आयोजन को रद्द करने की माँग उठने लगी। अशोक वाजपेयी इसे आयोजित कराने पर आमादा थे। आयोजन कराने के पक्ष में उनकी यह दलील अत्यन्त असम्वेदनशील थी जब उन्होंने यह कहा कि मरने वाले के साथ लोग मर नहीं जाते हैं। उनके इस वक्तव्य और आयोजन का विरोध पूरे देश में हुआ। 

दिल्ली में मंगलेश डबराल, विष्णु नागर, असद जैदी सरीखे एक युवा रचनाकारों का समूह हमलावर था तो उधर लेखक संघों के साथ “पहल” पत्रिका भी सख्त विरोध कर रही थी। अशोक वाजपेयी ने भव्य आयोजन कराया। जहाँ तक मुझे याद है कि इस आयोजन में रघुवीर सहाय ने भी शिरकत की थी। कुछ समय बाद अशोक जी का अज्ञेय प्रेम उमड़ आया। जिस अज्ञेय को “फिलहाल” पुस्तक में वह बूढ़ा गिद्ध कह चुके थे, वह उन्हें आदरणीय लगने लगे। भारत भवन को अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन से इमदाद मिल रही है, यह भी आरोप लगने लगा। नामवर जी और अशोक जी के बीच भी खटास आ गयी। पहले नामवर जी भारत भवन के स्टार अतिथि वक्ता होते थे, फिर उन्होंने  वहाँ आना जाना तज दिया। बहरहाल इस माहौल में मुझे “पहल” पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी ने अशोक जी की आलोचना पुस्तक “कुछ पूर्वग्रह” पर लिखने के लिए आग्रह किया। मैंने कुछ ना-नुकुर की। ज्ञानरंजन जी को जो जानते हैं, वह सहज समझ सकते हैं कि वह कितना दबाब बना कर लिखवाते थे। हालाँकि उन्होंने कभी भी मुझसे किसी लाइन पर लिखने के लिए नहीं कहा। अशोक वाजपेयी की किताब “कुछ पूर्वग्रह” पर मेरा लेख पहल में छपा। मेरा लेख पोलेमिकल था और कुछ तीखा भी। पहल के इसी अंक में अशोक जी की कविताओं पर भी एक क्रिटिकल लेख था। पहल में छपा मेरा लेख खूब पढ़ा गया। अशोक जी के कुछ प्रेमी नाराज भी हो गये। दिलचस्प यह कि अशोक जी ने कभी भी इस लेख के बारे में चर्चा नहीं की। मेरे ख्याल से अपनी आलोचना को ले कर वह थोड़ा सहिष्णु रहते हैं या शायद अपनी आलोचना का जिक्र करने की क्षुद्रता में उनका विश्वास नहीं है।  

वह शाम मुझे हूबहू याद है। 

नामवर जी का पटना में व्याख्यान था। शायद मार्क्स पर। नामवर जी को सुनने के लिए पटना का पढ़ा-लिखा समाज उमड़ पड़ा था। पूरा हॉल भरा हुआ था। अरुण कमल, अपूर्वानन्द और कुछ मित्रों के साथ हॉल के बाहर हम नामवर जी का इन्तज़ार कर रहे थे। जैसे उनकी कार आयी और खगेन्द्र जी के साथ नामवर जी उतरे, अरुण कमल और अपूर्वानन्द अपने कुछ युवा मित्रों के साथ उनकी अगवानी के लिए आगे बढ़े। उनसे अपरिचित होने के कारण संकोच से मैं अपनी जगह ठहरा रहा। नामवर जी अपनी कुर्ता-धोती की धज के साथ भीड़ से घिरे छोटे कदमों के साथ चल रहे थे। नामवर जी वैसे तेज कदमों से चलते हैं लेकिन सभा-गोष्ठियों में उनकी चाल बदल जाती। उनके डग छोटे हो जाते। अचानक मैं देखता हूँ कि वह मेरे सामने खड़े हैं। हडबडा कर मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। वह कहते है, विनोद दास जी! आपने अशोक पर बहुत अच्छा लिखा।” मैं सकपका गया। समझ नहीं पाया कि क्या कहूँ। मेरे होंठ इतना भर कहते है, ”जो मेरी थोड़ी समझ थी, वैसा लिखा।” “नहीं! विनोद दास जी आपने जैसा लिखा, वैसा मैं भी नहीं लिख सकता था। आपने अशोक के अंतर्विरोधों को सही पहचाना।’ मेरी घिग्घी बँध गयी। हाथ जोड़ कर कहा, “ऐसा कुछ नहीं”। नामवर जी आगे बढ़ गये। नामवर जी का उस रोज़ व्याख्यान अद्भुत था। उस दिन मेरा ध्यान उसके शब्दों पर कम केन्द्रित हो रहा था। मेरे कानों में बस नामवर जी के शब्द रह रह कर कौंध रहे थे। अगले दिन उन्होंने खगेन्द्र ठाकुर जी से मुझसे मिलाने को कहा। वह राजकीय अतिथि निवास में ठहरे थे। खगेन्द्र जी के साथ उनसे मिलने गया। उन्होंने वही बात दोहरायी और यह जोड़ा कि आलोचना पत्रिका में मैं लिखूँ। जब मैंने कहा कि डॉ नन्द किशोर नवल जी ने कुछ समीक्षाएँ लिखवायी हैं। इस पर उन्होंने कहा, “आप जो भी लिखना चाहे, लिख कर सीधे मुझे भी भेज सकते हैं।”

 फिर मेरा तबादला लखनऊ हो गया। लिखना थोड़ा बाधित हो गया। फिर मैंने कविता की एक छोटी पत्रिका “अंतर्दृष्टि” निकालनी शुरू की। उन्हें पत्रिका अच्छी लगी। शमशेर बहादुर सिंह से लिया मेरा साक्षात्कार उन्हें पसन्द आया। इसी बीच पहल  पत्रिका में केदार नाथ सिंह के कविता संग्रह “अकाल में सारस” पर मेरी लिखी समीक्षा छपी। समीक्षा केदार जी की काव्य दृष्टि को रेखांकित करते हुए थोड़ा क्रिटिकल थी। केदार जी रुष्ट हो गए थे। वे दिन नहीं रहे जब दिल्ली जाने पर जेएनयू जाने का उत्साह केदार जी से मिलने के लिए होता था। दरअसल नामवर जी भी वहीं रहते थे। 

एक दोपहर जब मैं एक बैठक में भाग ले कर लखनऊ स्थित अपने दफ़्तर की सीट पर लौटा, मेरे वरिष्ठ सहकर्मी ने लगभग चकित स्वरों में बताया कि डॉक्टर नामवर सिंह आपसे मिलने आए थे। उनके साथ हिन्दी संस्थान के निदेशक मधुकर द्विवेदी भी थे। वह होटल में ठहरे हैं। शाम को मिलने के लिए आमन्त्रित किया है। यह भी कहा है कि इसकी खबर कामता नाथ जी को भी मैं दे दूँ। कामता नाथ जी का दफ़्तर भारतीय रिज़र्व बैंक मेरे बैंक के करीब ही था। मैंने उन्हें खबर पहुँचा दी। दरअसल हिन्दी संस्थान पुरस्कार समिति की बैठक में हिस्सा लेने नामवर जी लखनऊ आए थे। 

जब मैं शाम को उनसे मिलने होटल पहुँचा तो होटल की लॉबी में कामता नाथ जी और कवि कुबेर दत्त मिल गये। कुबेर दत्त दूरदर्शन में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव थे। दूरदर्शन पर प्रसारित विनोद दुआ के लोकप्रिय कार्यक्रम जनवाणी के संयोजक भी रह चुके थे। उन दिनों कुबेर दत्त का तबादला सज़ा के तौर पर लखनऊ कर दिया गया था। मयनोशी में कुछ अराजक होने के बावजूद कुबेर दत्त गर्मजोशी से भरे एक अद्भुत सृजनात्मक व्यक्तित्त्व थे। लखनऊ दूरदर्शन के लिए उन्होंने महादेवी वर्मा को राज़ी कर के उन पर कई एपिसोड का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम तैयार किया था। हम तीनों साथ ही नामवर जी के कमरे में गये। कुबेर दत्त के पास अखबार में लिपटी सुरा की बोतल भी थी। मेरे लिए चाय मँगायी गयी। उस रात नामवर जी को मैंने नए रंग में देखा। कुबेर दत्त ने भी नामवर जी से कुछ निजी अटपटे सवाल पूछे। नामवर जी उन सवालों से जरा भी विचलित नहीं हुए। कुबेर दत्त की उदंडता को लेकर जितना मैं भौचक और दुखी था, नामवर जी की सहनशीलता देख कर उतना ही अधिक उनका प्रशंसक बन गया। पान रंगे दाँतों की मन्द-मन्द मुस्कराहट के साथ दूरदर्शन के किस्सों से ले कर धर्मवीर भारती, अज्ञेय, कमलेश्वर के बारे में उन्होंने अपनी बेबाक राय रखी। बातचीत के क्रम में उन्होंने यह जरा भी नहीं जताया कि एक कम उम्र का कवि उनकी निजी बातें सुन रहा है। चलते समय मैंने नामवर जी से कहा कि आप लखनऊ आये हैं तो इसका लाभ लखनऊ के रचनाकारों को मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जरूर! मैं तैयार हूँ। आप जहाँ कहेंगे, मैं हाज़िर रहूँगा। 

सच कहूँ! उनकी बात पर मुझे यकीन नहीं हो रहा था। 

गेंद अब मेरे पाले में थी। मेरे पास कोई ऐसी जगह का बन्दोबस्त न था जहाँ उनका कार्यक्रम कराया जा सके। सहसा मुझे उनके एक शिष्य की याद आयी जो एसूरेंस कम्पनी में हिन्दी अधिकारी थे। उनका एक ट्रेनिंग सेन्टर इन्दिरा नगर “बी” ब्लॉक में था। अगली शाम के लिए वहाँ आयोजन तय हो गया। फोन से अपने परिचितों को खबर मैंने कर दी। अनौचारिक बातचीत की रूपरेखा थी। कुँवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, मुद्राराक्षस, कामता नाथ, रवीन्द्र वर्मा, रमेश दीक्षित, अजय सिंह, राकेश, वीरेन्द्र यादव आदि आ गये थे। अधिक लोग नहीं थे। अचानक नामवर जी ने कहा कि विनोद दास जी, किस विषय पर आप सुनना चाहते हैं? इस पर वीरेन्द्र यादव जी ने कहा कि वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य पर आपकी राय हम जानना चाहते हैं। 

नामवर जी वक्तव्य की मुद्रा में आ गये। उन्होंने अपना व्याख्यान गाँधी और टैगोर के पत्राचार से शुरू किया जिसमें दो दृष्टियों की टकराहट को रेखांकित करते हुए उन्होंने उनकी परिवर्ती सहमति बिन्दुओं पर प्रकाश डाला। फिर बताया कि आज़ादी के बाद नेहरू ने किस तरह देश के सभी मुख्य सड़कों का नाम महात्मा गाँधी रोड और देश के सभी महत्त्वपूर्ण नगरों में रवीन्द्रालय के नाम से कला भवनो के निर्माण के लिए आदेश जारी किया था।फिर नामवर जी ने भारत भवन की सांस्कृतिक चेतना की आलोचना की। उनके व्याख्यान के बाद रमेश दीक्षित और अजय सिंह ने कुछ सवाल पूछे। मैं इस व्याख्यान को अपनी पत्रिका में प्रकाशित करना चाहता था लेकिन टेप रिकॉर्डर पर उसकी रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता खराब होने के कारण ऐसा न हो सका। मैं इस बात पर हतप्रभ था जिस नामवर सिंह को सुनने के लिए पटना में डॉक्टर खगेन्द्र ठाकुर को इतना तामझाम करना पड़ता था, वह इतनी सहजता से लखनऊ में सम्पन्न हो गया था जबकि मैं न तो नामवर जी का कभी छात्र रहा था और न ही उनकी पाँव पूजामण्डली का सदस्य। निश्चय ही यह नामवर जी की सदाशयता थी।   

उनकी सदाशयता की दूसरी मिसाल जयपुर में देखने को मिली। जयपुर के वरिष्ठ कवि और सम्पादक चन्द्रभान भारद्वाज दिल्ली नामवर सिंह से अपनी किताब का विमोचन उनसे कराने के लिए गए तो उन्होंने बताया कि वह जयपुर विश्वविद्यालय की बैठक में जल्दी आने वाले हैं, तब आप कर लीजियगा लेकिन यह कार्यक्रम का आयोजन विनोद दास की देखरेख में होगा। चन्द्रभान भारद्वाज वरिष्ठ कवि थे। “सम्प्रेषण” नामक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी करते थे। वह मुझ से मिलने घर आए। कार्यक्रम आयोजित करने के लिए मुझ पर नैतिक दबाव बनाया। मैं कार्यक्रम करने की स्थिति में नहीं था। दुबारा फिर घर आये और कहा कि उन्होंने नामवर सिंह से फोन पर बात की है। नामवर जी ने आपसे ही सम्पर्क करने को कहा है। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी कि जयपुर सरीखे नए शहर में साधनहीन होने के बावजूद यह आयोजन कैसे सम्पन्न कराया जाए। नामवर सिंह जी से मेरी कोई बात नहीं हुई थी। मैंने जवाहर कला भवन के वरिष्ठ अधिकारी और कवि हेमन्त शेष से सम्पर्क किया लेकिन उन्होंने नियमों का हवाला दे कर मना कर दिया। आखिरकार अपने सहयोगी सुनील पाण्डेय के सहयोग से राधाकृष्ण राजकीय लाइब्रेरी में जगह मिल गयी। राजस्थान पत्रिका के एक कोने में भारद्वाज जी ने अपने किताब की विमोचन की खबर प्रकाशित कराई थी। सुखद यह रहा कि वह सभागृह भर गया। नामवर जी ने किताब का विमोचन किया। हमेशा की तरह विचारोत्तेजक भाषण दिया जिसमें उन्होंने यह रेखांकित किया कि लोकतन्त्र में सिर्फ़ चुनाव को ही प्राथमिकता देना उसके मूल प्रकृति को कमतर करना है। हिटलर भी चुनाव जीत कर आया था। अगले दिन नवभारत टाइम्स के पहले पन्ने पर इस कार्यक्रम की रिपोर्ट कवि-पत्रकार संजीव मिश्र ने की। इन दोनों प्रसंगों का उल्लेख करने के पीछे यह संकेत करना था कि नामवर जी हमेशा हानि-लाभ का गणित नहीं करते थे। मुझे नहीं लगता था कि मैं उनके किसी काम आ सकता था। फिर भी उन्होंने मुझ पर भरोसा किया। 

नामवर जी अपनी आलोचना पत्रिका के लिए रचनाएँ जुटाने हेतु एक सतर्क आँख रखते थे। लखनऊ के दौरे के समय उन्होंने आलोचना पत्रिका के लिए युवा कवियों मंगलेश डबराल, असद जैदी, विष्णु नागर, अरुण कमल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल आदि पर आलोचना की एक शृंखला चलाने का प्रस्ताव मुझे दिया। प्रस्ताव मूल्यवान था। लेकिन आलोचना लिखने से मेरा मन उचट गया था। जब मैंने कहा,” अब मैंने आलोचना न लिखने का फैसला लिया है।” शायद वह कुछ भाँप गये थे। उन्होंने कहा कि आपने “बाबू साहेब” पर ठीक लिखा था। एक क्षण तो मैं समझ नहीं पाया कि वह बाबू साहेब किसे कह रहे हैं। फिर ख्याल आया कि शायद वह कवि केदार नाथ सिंह का ज़िक्र कर रहे हैं। अगर मैं उस दिन नामवर जी का प्रस्ताव मान जाता तो शायद आलोचना में कुछ हाथ आजमा लेता। यह सोच कर आज अफ़सोस होता है कि आलोचना पत्रिका के लिए उस समय कुछ नहीं लिख पाया जबकि उन्होंने मेरी पतली छोटी सी पत्रिका “अंतर्दृष्टि” के लिए दो अंकों में अपने दो लेख भी दिए जो शायद उनके व्याख्यान थे। 

नामवर जी विनोदप्रिय भी थे। कोई हास्यभरी उक्ति या मज़ाक करके जब वह मुस्कारते थे तो उनकी हँसी में मुझे उनके गुरुवर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की निर्मल छाया दिखती थी। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की चर्चा चली है तो सहसा मेरे मन में कौंधता है कि नामवर जी अपने व्याख्यान में किसी न किसी प्रसंग में अपने गुरु द्विवेदी जी और रवींद्र नाथ ठाकुर का जिक्र ज़रूर करते थे। उनका यह गुरु प्रेम मुझे कुछ-कुछ नामवर सिंह के शिष्य डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी में भी दिखता है। हाँ तो नामवर जी की विनोदप्रियता की बात हो रही थी। उनकी विनोदप्रियता की मीठी मार एक बार सार्वजनिक रूप से मुझे भी सहनी पड़ी। उस वर्ष श्रीकान्त वर्मा सम्मान के लिए मुझे चुना गया था। कार्यक्रम त्रिवेणी सभागार में चल रहा था। मंच पर केदार नाथ सिंह, नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी थे। संचालन कवि-गद्यकार अजित कुमार कर रहे थे। हॉल खचाखच भरा था। आगे की कुर्सियों पर डॉक्टर मैनेजर पांडेय, अशोक वाजपेयी, कुँवर नारायण, मनोहर श्याम जोशी आदि आसीन थे। निर्णायक समिति में शायद नामवर जी, कृष्णा सोबती जी, मनोहर श्याम जोशी जी, विष्णु खरे और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी थे लेकिन विष्णु खरे और कृष्णा सोबती जी सभा में मुझे नहीं दिखायी दिए। अध्यक्ष रूप के रूप में नामवर जी को बोलना था। उन्होंने मुझे बधाई देते हुए चुटकी ली कि विनोद दास उतने उम्रदराज़ नहीं हैं जितना बाहर से दिखते हैं। दरअसल उनका इशारा मेरे सिर पर कम केशों को ले कर था। उनकी इस उक्ति पर पूरा हॉल ठहाकों से भर गया। मुझे भी कुछ झेंप लगी। अपने लेखों और व्याख्यानों में भी उनके हास-परिहास के अनेक रूप देखने को मिलते थे। उस सभा में बोलते हुए अपने आत्मकथ्य में मैंने यह स्वीकार किया कि जब मैं राज्यसभा सचिवालय में कार्यरत था, तब श्रीकान्त वर्मा भी राज्य सभा सदस्य थे लेकिन आपातकाल में काँग्रेस की भूमिका ले कर उनसे मिलने के लिए कभी मेरे मन में उत्साह नहीं जगा जबकि मैं उनकी कविताओं और अनुवादों का प्रशंसक था। यह बात नामवर जी को नागवार लगी और उन्होंने इस पर तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। 

नामवर जी से मेरा संवाद विरल था। वैसे कोलकाता में जब भी कोई उनका व्याख्यान होता तो मैं सुनने जरूर जाता। नामवर जी का दूसरी भाषाओं के साहित्यिक समाज में भी सम्मान था। यह सम्मान उन्होंने अपनी मेधा, श्रम और व्यक्तित्व से अर्जित किया था। जहाँ वह अपने व्याख्यानों के लिए सुव्यवस्थित तैयारी करते थे, वहीं दूसरी और उनकी सबल स्मृति उनका बड़ा सम्बल थी। उन्होंने नज़रूल शताब्दी पर जब टैगोर और नज़रूल की कविताओं का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए अपना व्याख्यान कोलकाता में दिया तो हॉल में बैठे बांग्ला के अनेक लेखकों और विद्वानों को मैंने यह कहते हुए सुना कि यह अद्भुत व्याख्यान था। पश्चिम बंगाल में किसी गैर बांग्लाभाषी के लिए बांग्लाभाषियों से प्रशंसा पाना कितना मुश्किल होता है, यह केवल वहाँ रह कर ही समझा जा सकता है। 

इसी प्रकार नामवर जी का सम्मान ज्ञान के दूसरे क्षेत्र के अनुशासनों के विद्वानों में भी था। एक बार दिल्ली के कांस्टीटूयशन क्लब में राष्ट्रीयता पर एक संवाद आयोजित था जिसमें इतिहास के विद्वान और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विपिन चन्द्र मुख्य वक्ता थे। नामवर जी कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। जयपुर से संयोग से मैं दिल्ली आया हुआ था। मुझे याद है कि उस संगोष्ठी में नामवर जी ने अपने अध्यक्षीय अभिभाषण में विपिन चन्द्र की राष्ट्रीयता के बारे में की गयी एक-दो स्थापनाओं को प्रश्नांकित किया था। यही नहीं, उनके खतरों के बारे में भी सुझाया था। उस दिन उन दोनों में तीखी नोक-झोंक भी हुई। पहली बार इस तरह दो बड़े विद्वानों की बीच वाद-विवाद और सम्वाद का अपूर्व दृश्य मुझे देखने को मिला। सुनते हैं कि ऐसे दृश्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आम थे जहाँ उन्होंने लम्बे अरसे तक अध्यापन किया था। यही नहीं, उनकी अध्ययनशीलता और विश्लेषण शक्ति के प्रति दूसरे ज्ञान-विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वानों के बीच उनका गहरा सम्मान भी था। उस दिन यह लगा कि काश! मुझे  भी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला होता। नामवर जी ने जिस तरह वहाँ का पाठ्यक्रम तैयार किया और उर्दू तथा हिन्दी को जोड़ने का काम किया, वह सचमुच ऐतिहासिक था। इसी तरह संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ए. आर. किदवई के अनुरोध पर हिन्दी को आयोग में लागू करने और उसका पाठ्यक्रम तैयार करने में उनके अपूर्व योगदान को नहीं भूलना चाहिए।    

कोलकाता की एक सुबह थी। 

मैं दफ़्तर जाने की तैयारी कर रहा था। अचानक फोन की घंटी बजी। 

रिसीवर से आवाज़ आयी। ”मैं नामवर सिंह बोल रहा हूँ।” मैं अकबका गया। नमस्कार किया। नमस्कार का उत्तर देकर उन्होंने कहा, ”आप वागर्थ बहुत शानदार निकाल रहे हैं।” मैं हतप्रभ था कि उन्हें मेरे घर का फोन नम्बर कहाँ से मिला। बहरहाल उन्होंने बधाई दे कर मेरी सुबह खुशनुमा बना दी। 

वागर्थ में नामवर सिंह का इंटरव्यू प्रकाशित करना चाहता था। उनके इंटरव्यू बहुतायत में छपते रहते थे। इसका एक कारण था कि उनसे लिखित लेख प्राप्त करना सबको कठिन लगता था। अपने विचारों को मौखिक रूप से व्यक्त करने में नामवर जी दक्ष थे। मेरी इच्छा थी कि उनका यह साक्षात्कार कुछ अलग हो। नामवर जी ने स्त्री लेखन के बारे में क्या राय रखते हैं, इस पर कभी उन्होंने कुछ अपने विचार व्यक्त नहीं किए थे। उनके इस अज्ञात पक्ष पर इंटरव्यू के लिए कवयित्री अनामिका जी से अनुरोध किया। उदारमना अनामिका जी राज़ी हो गयीं। अनामिका जी का कहना था कि मैं नामवर जी को इसके लिए राज़ी करा लूँ। नामवर जी जब बात हुई तो वह इंटरव्यू के लिए राजी हो गए लेकिन वह इस विषय पर अनामिका जी से इतर किसी और से बातचीत के लिए इच्छुक थे। नामवर जी की यह सदाशयता थी कि बाद में मेरे दृढ़ आग्रह के बाद वह इंटरव्यू देने के लिए राजी हो गए। वह इंटरव्यू वाकई कुछ अलग था।

नामवर जी ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी से ले कर देश की अनेक अकादमियों की पुरस्कार समितियों में रहते हुए अनगिनत वरिष्ठ और युवा लेखकों के मस्तक पर गौरव मुकुट पहनाते थे लेकिन वरिष्ठ आलोचकों के लिए ऐसे सम्मानों का प्रावधान तब संस्थाओं में कम था। जिन दिनों मैं भारतीय भाषा परिषद से जुड़ा था, वहाँ उन दिनों 2001-02 के लिए भारतीय भाषाओँ की सृजनात्मकता को सम्मानित करने के लिए रचना समग्र पुरस्कार देने पर विचार चल रहा था। उर्दू, मराठी, उड़िया, कन्नड़, बांग्ला, राजस्थानी और हिन्दी के लिए पुरस्कारों के लिए लेखकों से नाम आमन्त्रित किए गए थे। अन्तिम चयन सूची के निर्णय के लिए विचार-विमर्श के बाद जो नाम तय किए गए, उनमें यू. आर. अन्नतमूर्ति (कन्नड), सीताकान्त महापात्र (उड़िया), दिलीप चित्रे (मराठी), बादल सरकार (बांग्ला), बलराज कोमल (उर्दू), डॉक्टर नामवर सिंह (हिन्दी), विनोद कुमार शुक्ल (हिन्दी), श्याम महर्षि (राजस्थानी) थे। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इन नामों के चयन में परिषद की समिति और सचिव ने मुझसे भी परामर्श किया था। मेरी संस्तुति पर उदारतापूर्वक विचार किया था। 22 मार्च 2003 को भारतीय भाषा परिषद के सभागार में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बांग्ला की समादृत लेखिका और समाज सेवी महाश्वेता देवी की अध्यक्षता में यह भव्य आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम का निमन्त्रण पत्र अत्यन्त कलात्मक था जिसकी अनूठी कल्पना परिषद की सचिव डॉक्टर कुसुम खेमानी ने की थी। समकालीन समय की चुनौतियों पर दूसरे सत्र में परिसम्वाद था जिसमें पुरस्कृत लेखकों के अलावा आलोचक डॉ शम्भू नाथ, उत्तम सेन गुप्ता और खाकसार भी था। शाम को विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं पर रंगकर्मी परनब मुख़र्जी द्वारा तैयार किये गये नाट्य कोलाज की अद्भुत सृजनात्मक प्रस्तुति हुई। नामवर जी को जब बांग्ला की कथाकार महाश्वेता देवी सम्मानित कर रही थीं तब उनकी आँखों में मुझे वैसी ही चमक दिख रही थी जिस तरह किसी युवा लेखक की आँखों में होती थी जब वह उसे स्वयं अपने हाथों से पुरस्कृत करते थे। 

नामवर जी से शिकायतें भी रही हैं। वह कभी-कभार कुछ ऐसा करते थे कि अनेक बार हम हतबुद्धि रह जाते थे। आरक्षण पर उनका नकारात्मक वक्तव्य कि आरक्षण रहा तो ब्राह्मण, क्षत्रिय के लड़के भाड़ झोंकेगे तो कभी किसी अधिकारी की किताब का विमोचन करते हुए उसे मुक्तिबोध के समकक्ष बताना सरीखे ऐसे अनेक प्रसंग रहे है जिनको ले कर हमारे जैसे उनके अनेक प्रशंसकों को गहरी निराशा भी होती रही है। यह अकारण नहीं था कि नामवर जी के शुरुआती दौर में किसी के नामोल्लेख से साहित्य में उसकी रचनाओं को पाठक और साहित्यकार उत्साह से खोजते थे, वहीं बाद में उनके वक्तव्यों की साख का आलम यह हो गया था कि हिन्दी के कवियों-कथाकारों की श्रेष्ठता के सम्बन्ध में उनके नामोल्लेख से लोग बस हँस कर उसे टाल देते थे। एक ऐसा पढ़ा-लिखा विद्वान् और सांस्कृतिक-अकादमिक दुनिया का महाबली किन कारणों से अपने जीवन के आख़िरी चरण में एक ऐसे सांस्कृतिक आयोजन में अपने सम्मान के लिए आतुर होकर जाता है जिसकी वैचारिक नीतियों का वह आजन्म विरोध करता रहा हो, इसकी गुत्थी मुझे कभी समझ में नहीं आयी। विडम्बना यह कि उस सम्मान में नामवर जी का सार्वजनिक रूप से अपमान होता है और भारत का सबसे प्रखर वक्ता ऐसे समय पर चुप रहता है। क्या यह उनकी अपनी बढ़ती उम्र के असर था या वह भीतर से ऐसे ही थे जिसे उन्होंने विचारों के कुर्ते के नीचे ढांप रखा था या यह ऐसा समय था जब हर शय बिकने के लिए तैयार था तो उस दौर में उनकी यह फिसलन थी, मैं कह नहीं सकता। मनुष्य के ऐसे क्षरण पर अध्ययन करने की ज़रूरत है कि किन स्थितियों में वह अपनी आस्था को तिलांजलि देकर अंतर्विरोधों की पोटली बन जाता है। एक बात मैंने और नोट की थी कि सत्ता के शीर्ष लोगों से हेलमेल रखने की ललक नामवर जी में थी। राजनेता चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, नटवर सिंह से अपनी मैत्री का प्रदर्शन करने में वह गौरव महसूस करते थे। तुलसी दास पर डॉक्टर राम विलास शर्मा ने क्यों नहीं लिखा, इस पर बात करते हुए लक्ष्मण यादव से नामवर जी एक इंटरव्यू में कहते हैं कि “हम लोग आमतौर से द्विधा विभक्त होते हैं। दो हिस्से होते हैं आदमी के। अपने लोक जीवन की एक सीमा होती है और आदर्श जो सोचते हैं, वह भावलोक है जिसमें हम मुक्त होना चाहते हैं।” मुझे लगता है कि यह बात स्वयं नामवर जी पर भी लागू होती है।   

नामवर सिंह की साहित्य के अलावा अन्य कलाओं में रूचि कम थी। उनकी छवि बेहद गम्भीर विद्वान की थी। एक बार मुम्बई विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में आये तो विविध भारती के उद्घोषक युनूस खान ने मुझसे नामवर जी से फिल्मों के बारे में एक इंटरव्यू करने के लिए आग्रह किया। पहले नामवर जी ने किसी दूसरे विषय पर बातचीत करने के लिए जोर दिया लेकिन बाद में वह फिल्मों पर बातचीत के लिए तैयार हो गये। उन्होंने पहली फिल्म कब देखी और उसका उनके मानस पर क्या प्रभाव पड़ा, यही नहीं, उन्होंने अपनी पसन्द की सिनेतारिकाओं के बारे में भी उत्साह से बताया। इस बातचीत से मुझे उनकी उन संवेदनाओं के अवयवों का पता चला जिससे उन्होंने अपनी आलोचना की रूखे सूखे गद्य को सरस बनाने में सफलता मिली थी। 

उनसे आख़िरी मुलाक़ात मुम्बई के उस आयोजन में हुई थी जिसे केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा ने आयोजित किया था। दोपहर में भोजन करते समय भी वह मुझसे मुम्बई महानगर के साहित्यिक परिदृश्य के बारे में चर्चा करते रहे। शायद ऐसी हल्की-फुल्की गपशप उनके स्वभाव का हिस्सा रहा है जो उनके लिए सूचना तन्त्र की तरह काम करता था। यह अकारण नहीं था कि देश के हर शहर के साहित्यिक तलघर में क्या पक रहा है, इसकी ख़बर उन्हें सबसे अधिक रहती थी। खानपान में उनका सन्तुलन मैंने कई बार देखा था। उनके सुगठित शरीर का भी यह एक राज़ था। एक राज उन्होंने मुझसे यह भी साझा किया था कि वह रात में चावल नहीं खाते और सोते समय कविता की कोई किताब उनके हाथ में ज़रूर होती है। कविता पढ़े बिना वह नहीं सोते। यहाँ यह उल्लेख करना असंगत न होगा कि नामवर जी मूलतः कवि थे। वह शुरुआती दौर में कविता लिखते थे और मंचों पर कविता पाठ भी करते थे।  

हिन्दी में आज ऐसे कितने कविता के आलोचक हैं जिनके सिरहाने मोबाइल की जगह कविता की किताब होती है, मैं नहीं जानता। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे आलोचक विरल ज़रूर होते जा रहे हैं।


................................. राजाराम भादू का वक्तव्य......................

फलक पर नामवर



कथाकार देवेंद्र का संस्मरण

साहित्य की कोई बड़ी गोष्ठी हो या कविता कहानी लिखने पढ़ने वाले चार-छःलोग किसी सड़क छाप चाय की दुकान पर यूं ही कोई बात कर रहे हों,अनायास ही बात सरक कर नामवर जी की ओर चली जाया करती।
क्या था नामवर जी में ?
कैसे कोई नामवर बनता है? पिता तो महज प्राइमरी स्कूल के टीचर थे।जब वे बीएचयू में पढ़ा रहे थे तो थोड़े दिन बाद ही उन्हें सस्पेंड कर दिया गया । जिन लोगों ने उन दिनों के नामवर को देखा था,बताया करते कि उनके क्लास में बैठने की जगह नहीं बचती थी । मेडिकल कालेज और इंजीनियरिंग तक के छात्र क्लास में खड़े होकर उन्हें सुना करते थे। यह तो रही बनारस की बात।
किसी काम से जोधपुर गया हुआ था। एक सज्जन ने अपना परिचय देते हुए बताया कि मैं नामवर जी का छात्र रहा हूँ।एक बार क्लास में वे "असाध्य वीणा" पढा रहे थे।मै पिछली सीट पर बैठा था, तभी पीछे के दरवाजे से चुपचाप आकर अज्ञेय जी मेरी बगल में बैठ गए।नामवर जी पढ़ाते रहे।क्लास खत्म होने के बाद हम सारे छात्र नामवर जी के पीछे हो लेते।उस दिन अज्ञेय जी भी थे।नामवर जी थोड़ा आगे जाकर रुक गए।उन्होंने अज्ञेय से पूछा-"कुछ बहुत गलत तो न पढा डाला?"
अज्ञेय जी ने कहा-"मैं इस कविता को इतना सुंदर ढंग से कभी न पढ़ा पाता।"
जितना मैं नामवर जी को जानता हूँ, वे हजारी प्रसाद द्विवेदी की तुलना में उदय प्रताप कालेज के अपने अंग्रेजी अध्यापक जे पी सिंह के शिष्य ज्यादा थे।यह बात अलग है कि उनके घर की किसी दीवार पर जे पी सिंह की कोई तस्वीर टंगी हुई नहीं दिखेगी।
गुरुओं की वह विलुप्त प्रजाति इक्के-दुक्के स्कूलों या छोटे कालेजों में ही बची रह गई है, जो अपने किसी छात्र की प्रतिभा को पहचान कर उसकी उंगली थामती और किसी बड़ी उम्मीद में उसे विश्वविद्यालय की ओर भेज आती है।उसे नहीं पता होता कि-
किसी शापित दम्भ स्तूप की तरह अपना ही कंकाल ढो रहे विश्वविद्यालय आज प्रतिभाओं के वधस्थल हो चुके हैं। यह सब केवल आज और रातों रात नहीं हो रहा।नेहरू युग को लेकर बौद्धिक सम्मोहन का जो भारी-भरकम वितान किताबों में फैला हुआ है, इतिहास के उन्हीं अंधेरे तहखानों में जर्जर ययातियों की यह रंगशाला कामुक वासनाओं की बदबू से भरने लगी थी। कुंजीछाप प्रोफेसरों के षड्यंत्र और दुरभिसंधियों की विषैली लताएं पूरे शिक्षातंत्र को बांझ औऱ बौना बना डालने के लिए कमर कस चुकी थीं।किशोरी दास बाजपेई को बिना बात यूं ही जेल में डाल दिया गया।मुक्तिबोध की किताब प्रतिबंधित कर दी गयी।हरिशंकर परसाई को उन्हीं के शहर में पीटा गया था।नगर- नगर में कुख्यात डोमा जी उस्ताद के बेरोक-टोक चल रहे प्रोसेशन की जासूस नजरों से छिप कर "भागता मैं दम छोड़,घूम गया कई -कई मोड़!"
नामवर सिंह को बार- बार बेहद छिछोरे और घटिया लोगों का कोप भाजन बनना पड़ रहा था।कलम के लिए निरंतर हो रहे इस "तंग स्पेस" में आखिरकार
"कहां जाऊं? दिल्ली या उज्जैन?
बनारस ,सागर और जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपतियों ने नामवर जी का निष्कासन किया।बहाने ढेर थे,लेकिन असल बात थी नामवरी।आज उन्हीं विश्वविद्यालयों में उनका निष्कासन करने वाले कुलपतियों को कोई नहीं जानता , लेकिन वहां के हिंदी विभाग अपने परिचय के साथ आज भी बताया करते हैं कि हमारे इस विभाग में नामवर जी रहे हैं।
छोटे- छोटे कस्बे से लेकर सुदूर महानगरों तक में स्थित साहित्य के बड़े- बड़े केंद्रों में तभी उनकी धमक सुनाई देने लगी थी।लगभग छह दशक तक वे समकालीन रचनात्मकता के अकेले केंद्र थे।पचास के दशक में वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और बाद में तो ऐसा हुआ कि कई दशकों तक प्रगतिशील लेखक संघ उनसे जुड़ कर घिसटता रहा है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में प्रेमचंद के बहाने मैं पहली बार नामवर जी को सुन रहा था।पूरे हाल में मंत्रमुग्ध सन्नाटा।संदर्भ आया कि-गोदान में शहर की कथा ठूंसी हुई है। ढेर सारे प्रसंग अनावश्यक और यथार्थ बहुत सतही है।-"अगर मैं गोदान लिखता"-जैनी जैनेंद्र नामवर जी के निशाने पर थे।वह "रामलीला " कहानी का पाठ कर रहे थे।एक साधारण सी लगने वाली कहानी के असाधारण अर्थ तह दर तह खुलते जा रहे थे।समझ तो मुझे आज भी बहुत कुछ नहीं है, तब तो इससे भी कम थी, लेकिन इस बात की कल्पना भी मेरे लिए असंभव थी कि कोई व्याख्यान इस हद तक श्रोताओं को बांध सकता है।पिन ड्रॉप साइलेंट! मैं विस्मित और विमोहित होता जा रहा था।
उसके पहले मैं सुन चुका था कि सूर चतुश्शती समारोह के अवसर पर बीएचयू ने नामवर जी को सम्मानित करने के लिए बुलाया था।आयोजन में खचाखच भीड़ थी। इस अवसर पर कुछ बोलने के लिए नामवर जी को बुलाया गया।लोग उत्सुक, उदग्र ! नामवर जी मंच पर गए।वे कुल तीन शब्द बोले-नियुक्ति पत्र,निष्कासन पत्र और आज यह सम्मान पत्र!कोई कुछ समझे समझे तब तक नामवर जी मंच से उतर लिए।देर तक तालियां बजती रहीं।
सूर औऱ उन पर हिंदी विभाग का चतुश्शती समारोह धरा का धरा रह गया।नामवर जी के तीन शब्द महीनों गूंजते रहे।विवाद उनके कुछ बोलने पर जितना होता था,उससे ज्यादा उनके कुछ न बोलने पर भी।
भव्य अट्टालिकाओं और घने पेड़ों से भरा-पूरा विशाल प्रांगण,एक दूसरे को काटते हुए दूर-दूर तक फैली कोलतार की चिकनी चौड़ी सड़कें।ईर्ष्या और द्वेष की मधुर मनोहर अतीव सुंदर राजधानी। आचार्य गणों द्वारा खूब मगन और भाव विभोर होकर अनुपस्थित सहकर्मियों के बारे में निंदा रस का छंदबद्ध कोरस गान यहां इस कैम्पस की अभूतपूर्व खूबी है।उसमें भीअव्वल हिंदी विभाग! यहां इतने भर के लिए पत्रिकाएं निकलतीं।सम्पादकीय लिखी जाती।सबके सब अजानुबाहु हैं।अपनी ही पीठ ठोकते रहने की वजह से भुजाएं लंबी।जबान उससे भी लंबी-
-नामवर सिंह अवसरवादी हैं ।
-छात्रों में प्रिय होना विद्वान होना नहीं है।
-मार्क्सवाद की तीन किताबें भर नहीं है हिन्दी
साहित्य।
-चुनाव-फुनाव लड़ने के लिए थोड़े मालवीय
जी ने विश्वविद्यालय बनवाया है।
-कौन कहता है कि नामवर कम्युनिस्ट हैं।उनकी
कोई विचारधारा नहीं।
नामवर जी के शिष्य रह चुके विश्वनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि निष्कासन के बारे मेंअफवाहों की काना- फूसी कुछ दिन पहले से सुनाई पड़ रही थी। निर्णय आते ही छात्र सन्न और कनफूसिया गिरोह के अध्यापक प्रसन्न। अस्सी से लेकर हिंदी विभाग तक विघ्न संतोषियों की "पौ बारह" थी।दूसरे दिन जब हम लोग विभाग में गये तो वहां एक निर्लज्ज और "घिनौनी खुशी" गंदगी की तरह बजबजा रही थी।जी मिचला उठा। छात्रों को लग रहा था कि कैम्पस में एक उदास सन्नाटा भर गया है।अजीब तरह का सुनसान बेगानापन। अब इस विश्वविद्यालय में कुछ न रह गया -हमने सोचा।
तबसे शुरू हुआ वह सिलसिला आजतक थमा नहीं। कबीर मठ के अतिविद्वान शुकदेव सिंह चुटकुले रचने में महामाहिर-कार की पिछली सीट पर बैठा एक आदमी तेजी से जा रहा था।सामने सड़क पर एक पैदल आदमी धोती कुर्ता पहने चला जा रहा था।कभी दाएं, कभी बाएं! ड्राइवर जिधर से गाड़ी निकालना चाहे, वह आदमी उधर ही हो लेता।ऐसे ही कभी दाएं, कभी बाएं।ड्राइवर और उसका मालिक दोनों बहुत देर तक परेशान होते रहे। ड्राइवर ने किसी तरह पार किया और खिड़की के बाहर सिर निकाल कर डांटना चाहा ।तब तक पिछली सीट पर बैठा आदमी उन्हें पहचान चुका था-"जल्दी भागो! ये नामवर सिंह है।कब दाएं,कब बाएं का रास्ता पकड़ लें ,कोई नहीं जान पाया।"
लेकिन यह सही है कि नामवर सिंह को पकड़ पाना किसी के लिए संभव न था उनका पीछा नहीं किया जा सकता ।उनके पीछे चलने वालों की एक बड़ी जमात थी।"कथाक्रम" की एक गोष्ठी में उन्होंने निर्मल वर्मा के हवाले कहानी की भाषा में संगीतात्मकता को जैसे ही रेखांकित किया कि अगले सत्र के बतौर मुख्य वक्ता परमानंद श्रीवास्तव का व्याख्यान कुछ इस तरह शुरू हुआ -"अगर फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने पहले कहानी संग्रह का नाम "ठुमरी"रखा तो यह अनायास नहीं था।वे भाषा में संगीत का महत्त्व समझते थे।"
उनकी भाषा में "विट" और "ह्यूमर" की धार थी, जिसका असर कविता की तरह होता था।और अगर उन्होंने किसी को छू भर दिया तो लोग महीनों विस्तर से उठ न सके।
शिवप्रसाद जी अपनी बेटी के इलाज के सिलसिले में वेल्लूर गए हुए थे।सुदूर गैर- हिंदी भाषी प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा।सीएमसी वेल्लूर से थोड़ी दूर एक छोटी सी पहाड़ी के बगल में उन्होंने किराए का घर ले रखा था।दवाओं की तीखी गंध,अस्पताल की ठंडी ऊबन,बेटी की बीमारी! शिवप्रसाद जी अकेले बहुत परेशान रहते। हिंदी विभाग में उनके विशाल व्यक्तित्व की जो आभा थी, वहां उसकी कोई चमक नहीं।वह रोज रोज ऊब रहे थे।मैं एक दिन सुबह- सुबह पहुंच गया था।उन्होंने कहा-उठो,चलो!तुम्हें मार्निंग वाक करा लाएं।
रास्ते में उन्होंने पूछा-बनारस के क्या हाल हैं?
मैंने बताया-"हजारी प्रसाद द्विवेदी पर नामवर जी की किताब आई है "दूसरी परंपरा की खोज"।
उन्होंने एक जगह लिखा है कि द्विवेदी जी ज्योतिष को जानते थे और शिवप्रसाद सिंह ज्योतिष को मानते थे।"
तत्काल तो मुझे यही लगा कि शिवप्रसाद जी ने इस बात को अनसुना कर दिया है।हम लौट कर घर आ चुके थे।लगभग सात- आठ घण्टे बाद शिवप्रसाद जी जोर से बोले-"यही नामवर का छोटापन है।खुद तो उनके साथ बैठकर घंटों हस्तरेखाओं का महत्त्व समझते- समझाते थे, और मुझे लिख दिया कि शिवप्रसाद अंध विश्वासी हैं, ज्योतिष मानते थे।उनके लिख देने से हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रगतिशील औऱ जनवादी हो जाएंगे।पक्के पोगा पंडित।घण्टों पूजा पर बैठा करते ।"
शाम को हम टहल रहे थे। बात अभी तक शिवप्रसाद जी की दाँत में अटकी हुई थी,जीभ उस छोटे तिनके से बार -बार जूझ रही- "मैं लोहिया फोहिया के प्रभाव में बिल्कुल न था।चंद्रबली सिंह मुझ पर नामवर से ज्यादा भरोसा करते थे।मैं प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल भी हो जाता। लेकिन मैंने कहा कि जहां नामवर होंगे, वहां तो मैं जा ही न सकता।"
नामवर जी को लेकर शिवप्रसाद जी के मन में कोई पुरानी,शायद छात्र जीवन के दिनों की ही बहुत गहरी गांठ थी,जिसके चलते वह अक्सर बचकाने बयान दे दिया करते।लेकिन बनारस ही नहीं, दिल्ली,भोपाल,पटना अनेक शहरों में साहित्य के बड़े -बड़े प्रतिष्ठित लेखक नामवर सिंह का नाम सुनकर भड़क उठते।और तो और, एक बार मैं रेडियो पर नीरज का काव्यपाठ
सुन रहा था।अचानक एक लाइन आई-"हिंदी के नामावर चाहे जो भी कह लें....।"
सबकी एक ही खुन्नस कि हमने इतने ग्रंथ लिखे।इतने -इतने हमें पुरस्कार मिले।सारा हिंदी जगत मेरे पैरों तले। लेकिन नामवर ने मुझपर दो लाइन भी न लिखा।यह भी कोई आलोचना है।नामवर को आलोचना का क ख ग कुछ नहीं पता।नामवर जातिवाद करते हैं।भाई भतीजा वाद करते हैं ।वगैरह वगैरह।
छोटी सी मुसीबत पड़ती है तो रात दिन घेरे रहने वाले संबंधों में कितनी जान है, सब पता चल जाता। नामवर जी तो तीन -तीन विश्वविद्यालयों से निकाले गए थे । कुछ भी छिपा न था।एक क्रांतिकारी अध्यापक की बात चली तो कहने लगे- "अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर, अमरीका या रूस के खिलाफ लिखने और बोलने में कभी कोई प्रत्यक्ष रिस्क न रहता।बहुत आसान है इस तरह से क्रांतिकारी बने रहना।आदमी की असलियत जाननी है तो देखो कि अपने ऑफिस में, जहां वह काम करता है,जहां उसके हस्तक्षेप से चीजें तत्काल प्रभावित हो सकती हैं,वहां अपने बॉस से उसके क्या और कैसे सम्बन्ध हैं?बहुत सारे क्रांतिकारी अपने बॉस की चापलूसी करते हैं, क्योंकि रोजमर्रा के जीवन में खतरा वहीं ज्यादा रहता।"
उनके पास तरह-तरह के लोगों से जुड़े ढेरों अनुभव और किस्से थे, उन्हें लोगों की खूब पहचान भी थी।अवसर देख कर वह अपनी चाल चलने में कोई कसर भी न छोड़ते।
पहला "कथाक्रम -सम्मान" संजीव को मिल रहा था।उन दिनों कथाक्रम के आयोजन का अपना जलवा होता।सच्चे अर्थ में साहित्य का महाकुंभ।नामवर जी मुख्य अतिथि।उनके होने मात्र से कथाक्रम के उस आयोजन में नगर उमड़ पड़ा था।उन दिनों बिहार से लेकर दिल्ली तक, नए लेखकों में संजीव एक स्कूल की तरह सम्मानित थे।नामवर जी ने अब तक उनपर कहीं कोई वक्तव्य नहीं दिया था।आज जब वे इस आयोजन के केंद्र में हैं तो लोग नामवर जी को सुनना चाहते थे।नामवर जी मंच पर आये, उन्होंने संजीव को बधाई दी और आज लिखी जा रही ताजा कहानियों के वर्तमान फलक पर बोलना शुरू किया ।उनके पूरे वक्तव्य के केंद्र में "पाल गोमरा का स्कूटर "और "जल डमरू मध्य"।छिटपुट तौर पर कुछ और इधर उधर।संजीव का कहीं नामोनिशान नहीं।संजीव की दशा उस बूढ़े , जर्जर दूल्हे सी हो गई जिसकी शादी में सारी लड़कियां सहबाले का मंगल गीत गाने लगी हों।फिर तो मंच पर आने वाले एक- एक कर सारे वक्ताओं ने वही रास्ता पकड़ लिया।कार्यक्रम खत्म हुआ ।संजीव बड़बड़ा रहे थे।उदय प्रकाश नामवर जी की जाति- विरादरी वाले कथाकार।ऐसे ही लोग थोड़े कहते कि नामवर साहित्य में भी जाति- विरादरी की राजनीति करते हैं।
(वासनाएं सबसे पहले विवेक का हरण कर लेती हैं। फिर तो आप किसी पर कुछ भी बक सकते हैं।)
ऐसे ही एक बार ओमप्रकाश बाल्मीकि भी उन पर कुपित होकर लगातार भर्त्सना किये जा रहे थे।मैँ था,महेश कटारे भी।और भी बहुत सारे लोग थे।मैंने बाल्मीकि जी को बताया कि दुधवा में हमारे साथ श्रीलाल जी भी थे।नामवर जी आपकी तीन -चार कहानियों और जूठन की देर तक तारीफ करते रहे।उन्होंने श्रीलाल जी से कहा कि जूठन पढ़ने के बाद दलित राइटिंग के बारे में मेरी धारण बदल गई।" लेकिन उस समय बाल्मीकि जी नामवर निंदा की दूसरी रौ में थे-"जूठन नामवर सिंह का मुंहताज थोड़े है।"
रात को खाना-पीना करके मैँ गेस्टहाउस के बाहर टहल रहा था। मुझे अकेला देख कर ओमप्रकाश बाल्मीकि भी आ गये-"देवेन्द्र जी ,क्या कह रहे थे नामवर सिंह दुधवा में?कैसे बात शुरू हुई थी।श्रीलाल जी ने क्या कहा था?"आदि आदि।
कभी -कभी वे किसी गोष्ठी में कही गई अपनी ही बात के विरोध में कोई दूसरी स्थापना दे दिया करते। "दूसरी परंपरा की खोज" को पढ़कर चौथीराम यादव ने रामचंद्र शुक्ल और ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ मोर्चा ही खोल दिया था।
इसी समय मार्क्सवाद के भीतर सवर्ण वर्चस्व से क्षुब्ध दलित लेखन के निशाने पर भी पहले ब्राह्मणवाद और फिर ब्राह्मण आ चुके थे।साहित्य की हर छोटी -बड़ी, लगभग सारी गोष्ठियों में तुलसी दास और रामचरित मानस की लानत- मलामत हो रही थी।शुक्ल जी की समाधि पर मूतने वालों में गजब की होड़ मची हुई थी ।
तभी नामवर जी ने बीएचयू की एक गोष्ठी में किसी अमरीकी आलोचक का जिक्र करते हुए बताया कि अपने समय के उस सबसे बड़े आलोचक की एक- एक कर सारी स्थापनाएं कालांतर में कटती चली गईं ।और हर बार उसका कद पहले से बड़ा होता चला गया।आज पूरी अमरीकी आलोचना का विकास उसी से टकराकर सम्भव हुआ है।ऐसे ही थे हिंदी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल।उन्हें नजरअंदाज करके कुछ भी नया रच पाना असंभव है।
जैसा कि मैंने कहा कि नामवर जी का पीछा करना किसी के लिए संभव न था।वे अपने पीछे- पीछे चलने वालों के लिए भी अक्सर मुश्किलें खड़ी कर देते थे। बहरहाल,इस बार चौथीराम जी को कोई मुश्किल न हुई।वे नाथों, सिद्धों की लगाम थाम चुके थे । उन्होंने तुरत- फुरत हठ योग की कुंडलिनी जागृत की और लोकधर्म के राजमार्ग पर दलित सौंदर्यशास्त्र का "माइलस्टोन" बन गये। इन दिनों साहित्य में इन्हीं का बाजार था।सुधीजन समय की गति जान जाते और संतहृदय सरल पथ गामी होते हैं।चौथीराम जी सुधीजन और संतहृदय विख्यात हैं।
एक बार बनारस प्रवास के दौरान नामवर जी गंभीर रूप से बीमार हो गए थे।क्या बीमारी है? डॉक्टरों को भी कुछ समझ न आये।उन्हें "एम्स" में भर्ती कराया गया।बाद में जब तबीयत थोड़ी ठीक हुई तो मनोहर श्याम जोशी उन्हें देखने गए हुए थे,उन्होंने नामवर जी से कहा कि चारो तरफ हल्ला है कि डॉक्टर लोग नामवर जी की बीमारी पकड़ नहीं पा रहे।मैंने कहा कि, पूरा हिंदी जगत लगा रहा कि नामवर जी की विचारधारा को पकड़ ले ,और आज तक न उसे पहचान सका न पकड़ सका, फिर डॉक्टर क्या खाकर नामवर जी की बीमारी पकड़ पाएंगे।" एक लंबे ठहाके में यूं ही बातों का आना -जाना लगा रहा।
अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में एक बार उन्होंने बताया कि, "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां","इतिहास और आलोचना" तथा "छायायावाद", दरअसल मेरे कुछ क्लास नोट थे , जिनके आधार ये पुस्तकें लिखी गयीं। मंच पर तो सामने वाले से, लेकिन जब भी अकेले होते, सबसे ज्यादा अपने आप से जूझते थे।खुद को मांजते और बात को बढ़ाते हुए कहने के ढंग को बदलते थे।यही है उनका "अंधेर में:पुनश्च"।उनकी इस पूरी प्रक्रिया का राई-रत्ती बोध न हो तो कोई आसानी से कोई कह सकता है कि,नामवर सिंह अवसरवादी थे।वे श्रोताओं का मूड देखकर, अवसर के अनुरूप बोलते थे।लेकिन,जी नहीं ! नामवर जी को सुनने के बाद श्रोताओं का मूड बदल जाया करता था।एक बार नहीं ,हजारों गोष्ठियों में, हजारों बार ऐसा हो चुका है।अकाट्य उद्धरणों की भीड़ जुटाकर रामविलास जी ने मुक्तिबोध को आत्मग्रस्त और अस्तित्ववादी सिद्ध कर डाला था, लेकिन नामवर जी के सामने उनकी नहीं चली तो नहीं ही चली।
लंबे समय तक की बेरोजगारी ने उन्हें पैसे रूपये खर्च करने के प्रति कंजूसी की हद तक सजग कर दिया था।किसानों का स्वभाव ही है कि जब तक हो सके अपनी जेब ढीली न करनी पड़े।राजेन्द्र यादव ने बहुत भोलेपन से पूछा-नामवर जी आप कुर्ता किस टेलर से सिलवाते हैं?
"क्यो- नामवर जी ने बताया-काशी बनारस से आते हैं तो वही लिए आते।"
"आपके कुर्ते में मैंने कभी पाकिट नहीं देखी"-राजेन्द्र जी अक्सर उनसे खूब चुहल करते-"वे पत्र, जिन्हें आपने मुझे बनारस में पढ़ाए थे,उससे कभी मिले कि नहीं ?
"तान के सोता रहा जल चादर,
वायु सा खींच जगा गया कोई।"
उस "कोई" के पत्र बचे हों तो दे दीजिए,हंस में छाप दूं।" नामवर जी बातों को टालने और बातचीत का विषय बदलने की कला में निपुण थे।
मैंने एक बार काशीनाथ जी से ऐसे किसी पत्र की बाबत पूछा तो माँ जी ने मुझे ही डांट दिया-"आपको और कोई काम नहीं रहता क्या।फालतू की बातों में बस मन लगता है।"
पत्र के बारे में "हां या नहीं,"-काशीनाथ जी ने कुछ नहीं कहा,वह चुपचाप उठे और दूसरी ओर चले गये।
घर में नामवर जी भगवान सरीखे थे।लोग उनमें मनुष्य जैसा कोई आभास होने मात्र से कांपने लगते। राजेन्द्र यादव! महानताओं और मर्यादाओं के जन्मजात द्वेषी, मैंने सोचा ,
उनका क्या ? वे तो किसी के बारे में कुछ भी
अनाप-शनाप कहते ही रहते हैं।
हंस में कुछ बहुत अच्छी कहानियां छप चुकी थीं, कुछ बेहद वाहियात भी।नामवर जी ने यादव जी के कथा-विवेक पर चुटकी लेते हुए कहा कि राजेन्द्र की दशा उस हलवाई की तरह हो गई है जो दिन भर तरह तरह की मिठाइयों से घिरा रहकर अच्छे और बुरे का "स्वाद- भेद" भूल चुका है।
दिसंबर का महीना।दुधवा के घने जंगल में शाम ढल रही थी।नामवर जी के साथ ऐसा दुर्लभ सुयोग बहुत कम लोगों को मिला होगा। कोई कैमरा नहीं,पत्रकार नहीं।श्रीलाल जी थे और सिर्फ मैं । लखीमपुर खीरी में बिताए गए चौबीस सालों के मेरे अकेले और एकमात्र मित्र एडवोकेट जेपी भी मेरे साथ थे।शहर में होने पर जेपी नियमित कचहरी जाया करते हैं, लेकिन वकालत के मामले में बिल्कुल बाल ब्रह्मचारी।श्रीलाल जी और नामवर जी के बीच कुछ निहायत निजी और पारिवारिक बातें हो रही थीं।हमने थोड़ी दूरी बरत ली थी।श्रीलाल जी की कही गई किसी बात का संदर्भ था।नामवर जी बता रहे थे कि बेटों से बचपन में नहीं,जब वे बड़े और जवान हो जायँ तब हमारा व्यवहार सख्तऔर सजग होना चाहिए,वरना वह घर, जिसे आपने जीवन भर की पूंजी से बना रखा है,आपका शरणगाह हो जाता है । और आप बेचारे गजाधर बाबू!
दुधवा गेस्ट हाउस । दिसम्बर की शाम, साढ़े छह बजते-बजाते गाढ़ी रात सी होने लगी थी। समय खूब सारा था। पिछली रात मैं जान चुका था कि भोजन के बाद श्रीलाल जी भरपेट मिठाई खाते हैं,बावजूद इसके कि वे डायबिटिक हैं। हमने पलिया से ही मिठाइयों की खूब व्यवस्था कर ली थी।
"नामवर जी,आजकल हर जगह उत्तर आधुनिकता की ही रट लगी हुई है।मुझे इसके बारे में कुछ नहीं आता जाता।यह क्या है?"-श्रीलाल जी ने पूछा।
सायं सायं करते जंगल की गंध गेस्ट हाउस में भरने लगी थी। गिलासें लग चुकी थीं। माहौल द्रवित होने की ओर था।वह नामवर जी का एक अविस्मरणीय क्लास था।शिष्यवत बैठे जिज्ञासु श्रीलाल जी के साथ मैं भी था। नामवर जी ने इत्मीनान से बोलना शुरू किया-इनमें कुछ लोग मार्क्सवादी हैं,कुछ उसके विरोधी।देरिदा,फूकोआदि आदि।इनमें कब किसने, कहां, और क्या लिखा?लिखने का संदर्भ क्या था? फलां ने उसका कैसे प्रतिकार किया? एक- एक बात का बारीक ब्यौरा।लगभग ढाई घंटे तक।श्रीलाल जी बार बार कसमसा रहे थे-"नामवर जी, बस थोड़ी देर यहीं रुके रहिए।मुझे आ जाने दीजिए"- देर से उन्हें खूब जोर की पेशाब लगी थीऔर वे एक पल के लिए वहां से हटना भी न चाहते थे।
बीच-बीच में नामवर जी खूब इत्मीनान से संस्कृत के श्लोक,हिंदी की कविताएं और उर्दू की गजलें सुनाते जा रहे थे।श्रीलाल जी ने कहा-"स्मृति तो मेरी भी अच्छी है।लेकिन संस्कृत के श्लोकों से आगे गति नहीं है,आपको हिंदी कविताएं बहुत याद हैं।"नामवर जी ने हंसते हुए कहा कि मुझे खराब कविताएं और जल्दी याद हो जाती हैं ।
उन्होंने लिखा कम।घूमे खूब ज्यादा थे।विश्व साहित्य के इतिहास, भूगोल के एक-एक गलियारे से बखूबी परिचित । कला और संगीत ही नहीं, ज्ञान के दूसरे अनुशासनों में भी अधुनातन कहां, क्या कुछ चल रहा है,सब पर उनकी पैनी नजर बराबर बनी रहती। किसी सभा, गोष्ठी में मंच पर बैठे हुए वे यूं तो पान घुलाते हुए ही सबको सुना करते, पर जैसे ही एक मामूली जुम्बिश के साथ दांत को तिनके से खोदना शुरू करते, समझने वाले को देर नहीं लगती कि बात अब दांत की पकड़ में आ चुकी है। उन्हें माइक की ओर बुलाये जाने के साथ ही खचाखच भरे हाल में सन्नाटा खिंच जाया करता।श्रोताओं की सांसें थम जातीं। पहले किसने क्या बोला है,सब धुल-पुंछ जाता। और सुनने वालों की स्मृतियों में हमेशा -हमेशा के लिए नामवर सिंह टंक जाया करते।
रामविलास शर्मा के बाद हिंदी आलोचना के वे ऐसे वटवृक्ष थे, जिसके आसपास कोई दूसरा पनप न सका।यह बात अलग है और सही भी कि माल चाहे जितना कूड़ा हो,कोई अपना धंधा थोड़े बन्द कर देगा। मैनेजर होना भी लेखन की एक खास कला है।खासकर ऐसे समय में जब कविता, कहानी के हर मुहल्ले में किसी न किसी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समीक्षक के आशीर्वाद से अमरत्व की उम्मीद हिलोरें मार रही हों।बाबा नागार्जुन ने कभी एक कविता लिखी थी-
"आलोचक है नया पुरोहित......
अगर कीर्ति का फल चखना है
आलोचक को खुश रखना है।"
उसमें होना एक ऐसे आलोचक का, जिसने कभी किसी के खुश होने की परवाह नहीं की। उन्होंने सब कुछ हासिल भी किया, लेकिन अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर हासिल किया,किसी को खुश करके कभी नहीं। न बाहर, न घर में।
घर में तो वे बिल्कुल अलग ढंग से पेश आते।मंटू का प्रोफेसर पद पर प्रमोशन था।वाइसचांसलर नामवर जी के परम् मित्र थे।अगर वे हल्का सा जिक्र भी कर देते तो मामला बन जाता,जबकि घर में वे सबसे सीरियस होकर मंटू को ही सुनते थे।लेकिन उन्हें जो काम नहीं करना है तो उसे नहीं ही सुनते ।काशीनाथ जी या मंझले भाई रामजी को तो उनसे मामूली बात कहने के लिए भी महीनों मशक्कत करनी पड़ती।पंजाब में आतंकवाद का चरम था।सूरज डूबने के साथ ही सड़कों पर दहशत और सन्नाटा फैल जाया करता।खून में डूबा पंजाब दिन ब दिन नरक हो रहा था।इकलौते बेटे विजय की पोस्टिंग भटिंडा में थी।कब किधर से निकल आये ए के सैंतालीस-छप्पन।उन्होंने अपना दुखड़ा बनारस आकर दोनों चाचा लोगों से रोया।
महीने भर बाद नामवर जी को बनारस आना था।तय हुआ कि अबकी आने दो ,यह भी कोई बात है।आप दुनिया भर के लिए इधर -उधर करते औऱ कहते भी रहते हैं।खुद का अकेला बेटा आग में घिरा हुआ है।दोनों भाई लोग हर सुबह बैठकर रियाज करते रहे-इस बार जरूर कहा जायेगा।
ऐसे अनेक अवसरों पर मैंने देखा कि नामवर जी भाइयों की मुश्किलें भांप जाया करते थे।मंझले भाई रामजी सिंह ने मोर्चा संभाल रखा था।हलक सूख रहा था।जबान चिपक-चिपक जा रही।बड़ी मेहनत से किसी तरह-"भैया, विजय बहुत परेशान हैं।कुल पंजाबी ससुरे बंदूक लेकर घूम रहे।लइकन बच्चन के कब टीप दें, कवनो भरोसा नाहीं।" पीछे से काशीनाथ जी ने भी साथ दिया-"आजकल पंजाब बहुत मुश्किल हो रहा है।"
जब वे सामने वाले की किसी बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहते तब भी दांत खोदने लगते-"ऐसा है काशीनाथ जी, प्रगतिशील लेखक संघ में आप सक्रिय हैं,एक सामूहिक ज्ञापन भिजवा दीजिए कि खालिस्तानियों को पंजाब दे दिया जाय।ये वहां नौकरी नहीं करेंगे तो दूसरा कोई क्यों करे।"
इसके बाद वे उठकर अपने कमरे में चले गए।महीने भर की सारी मशक्कत हवा,हवाई ! दोनों भाई चुप !
वी पी सिंह उस समय प्रधान मंत्री थे।नामवर जी के बाल सखा।मंझले भाई रामजी सिंह ने लंबे समय तक कचहरी में नौकरी की थी।वे जानते थे कि सरकारी काम कैसे कराया जाता है।वी पी सिंह को जैसे ही पता लगा कि नामवर जी के बेटे का ट्रांसफर होना है तो काम तुरंत हो गया।
लगभग डेढ़ दशक तक इधर उधर भटकते रहने के बाद जेएनयू में नामवर जी को वह सब कुछ मिला, जिसके लिए वे धरती पर आए थे।रिश्तों और संबंधों से भरे- पूरे होने के बावजूद खंखड़ जीवन में पहली बार बेटी समीक्षा का शोख और प्रसन्न सानिध्य मिला।ढेर सारे छात्र मिले।
जेएनयू का निर्मल माहौल मिला।लेकिन इतना सब हो कर भी, वह जेएनयू की वजह से नहीं, जेएनयू उनकी वजह से हमेशा जाना जाता रहेगा।
आज जब वे वहां नहीं हैं, तब भी हिंदी विभाग और एडमिन ब्लाक के आसपास या गंगा ढाबे पर बैठे हुए छात्र उनके किस्से सुनाया करते हैं।गल्प कथाओं और किंवदंतियों की तरह उनकी व्याप्ति थी।दुनिया के सारे लोग जिसकी प्रशंशा करें बस वही एक अच्छा हो, यह कोई जरूरी नहीं।कभी- कभी तो मुझे ऐसा लगता कि बौद्धिक जगत में किसी को बहुत अच्छा कहना या घोघावसंत बताना लगभग एक जैसा ही है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने सारे लोग नामवर के निमित्त आज भी
निंदा पुराण का सस्वर पाठ दुहराते चाहे-अनचाहे मिल जाय करते हैं।हिंदी संसार विश्वविजेता दुर्मुख रणबांकुरों से कभी रिक्त नहीं रहा है। कुंवर चंद्र प्रकाश सिंह को हिंदी संस्थान का प्रतिष्ठित "भारत भारती" सम्मान मिला। गदगद होने का अवसर था। पत्रकारों से पहली प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि "अज्ञेय और नामवर सिंह जैसों की वजह से मैं साहित्य में चर्चित नहीं हो सका था। "
मुद्रा राक्षस ऐसे अवसरों पर कब चूकने वाले।उन्होंने छूटते ही टिप्पणी की-"यह आदमी अपनी प्रचंड मूर्खता और धृष्टता के लिए हिंदी में हमेशा याद किया जाएगा कि खुद से 35 साल बाद पैदा होने वाले नामवर सिंह की वजह से वह साहित्य में अचर्चित रह गया था।"
विवेक को ताख पर रखकर साहस से भरे ऐसे अनेक और असंख्य वक्तव्य नामवर सिंह के लिए समय-समय पर सुनने को मिलते ही रहते हैं।
जिन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी को जिया उन पर लोकापवाद के कंकड़ फेंके ही जाते रहे हैं।इसके लिए नामवर से मुफ़ीद कौन हो सकता था जो कभी किसी के अन्धानुगामी होकर नहीं रहे।
मार्क्सवाद उनके लिए टार्च की रोशनी भर था, जिसकी मद्धिम लौ में वह पार्टी के लिए कार्यकर्ताओं की खोज नहीं कर रहे थे, बल्कि संस्कृत और अपभ्रंस से लेकर आज तक के साहित्य की समृद्ध विरासत में दूसरी परंपरा की खोज करते हुए,जैसा कि एन डी टीवी के प्राइम टाइम कार्यक्रम में रवीश कुमार ने कहा था - "वह अपने आप में एक परंपरा थे। विवादित भी और मर्यादित भी।" विवेकसम्मत मर्यादा न हो तो जीवन में भी, और साहित्य में भी सहमति और असहमति उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। लोग उनसे सहमत या असहमत हो सकते थे, लेकिन उन्हें अस्वीकार कर सकने का किसी में दम न था।
क्योंकि वे शब्द में समय की पदचाप सुन सकते थे।आलोचना तर्कों से परास्त और पराजित करने की दक्षता का नाम नहीं है।एक बड़ी रचना प्रक्रिया से गुजरते हुए अपने समय के साथ किया गया सबसे सार्थक संवाद ही आलोचना है।यहां सही और गलत के फैसले वकीलों की जिरह से नहीं तय हुआ करते।इतिहास के निर्मम न्यायबोध के सामने सिर्फ हीरे की चमक बची रह जाती है।क्योंकि जो जितना ही ज्यादा अपने समय के भीतर होता है, उसी में कालातीत होने की संभावना भी होती है।
आज जब नामवर जी नहीं हैं तो यही लग रहा कि हिंदी साहित्य से एक बड़ा साया उठ गया है।यह भी तय है कि समय किसी के भरोसे रुक नहीं जाता, लेकिन कुछ पैरों के निशान इतने गहरे होते हैं कि उन्हें मिटा पाना समय के लिए भी नाकों चना चबाने जैसा है।ऐसे ही हैं हिंदी के नामवर।

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